Thursday, March 10, 2011

रामानुज अस्थाना की कविता


रूमाल


मैं तुम्हारे हाथ का रूमाल था।
हाथ से फेंका गया.....................
पलट कर देखा गया ?
आज वे संवेदनाएँ सड़ रही हैं,
गल गया अस्तित्तव मेरा,
ढल गया मादक सवेरा,
और अविरल योजनाएँ थीं सुगन्धित;
रुक गयी हैं।......................................
मेरे यौवन के दिनों में-
तुम मुझे इतर में नहलाकर;
अपने हृदय के स्तर में छुपाकर
सहेजते थे।
फिर कभी......... हाथ में लेकर अचानक!
प्रेयसी के कर-कमल  सा-
मसल देते थे सस्मित -
और दोनों हाथ -
सहलाते थे मेरा पूर्ण तन-मन
रोम मेरे फूल जाते -
मैं सिहर उठता पुलक हो;
तब मृसण खरगोश सा
तुम एक कर से दूसरे कर में बदलते;
खेलते हो तुम मुझी से -
प्यार में मैं जानता था।
पर नहीं पहचानता था।
उस समय जब...... चीफ ने बुलवा लिया था,
तुम विवश हो मुझे लेकर चल दिए थे।
मैं सहम कर दब गया था हाथ में;
स्वेद पूरित और तुम भी हो रहे थे,
पी गया था मैं -
तुम्हारे हाथ का वह स्वेद भी;
और कम्पन की तरंगे सह रहा था-
तब एकाएक हाथ मत्थे से लगाकर -
स्वेद मिश्रित भय मुझे ही दे दिया था।
मैं रहा था मौन..........................................
इसका भेद भी किससे कहा था?
और जब सर्दी हुई थी -
शीत लहरी भय दिखाकर;
वायु के झोंके सताते थे गले को..........
तुम मुझे अपने गले में भींच लेते;
और मैं एक कुल वधू सा ..............
डालकर बाहें गले में ऐंठता था,
और सासें गर्म करती थीं..............
अनोखे प्यार से ,
और जब भी सांस में अवरोध आता
घ्राण द्वय मैं खोलता था
भींचते थे तुम लगाकर हाथ से;
मैं घृणा से क्या कभी भी डोलता था।
तुम मुझे फिर स्वच्छ  करके -
इतर से गुलजार करते;
मैं समझता था मुझे तुम प्यार करते।
पर चलो अच्छा हुआ
भ्रम ही सही; पालते थे तुम मुझे;
और मैं तेरा उपकार करता।
कौन किसको प्यार करता
मैं बना सहचर; तुम्हारे कर्म का।
भेद मैं ही जानता था मर्म का।
जब कभी रिश्वत तुम्हारी था पचाता।
और तुझे अस्तित्व खोकर था बचाता।
रिश्वत थी; कि-
मर्यादा तुम्हारी ढक रही थी
मेरे अन्दर ही;
तुम्हारी गोल खिचड़ी पक रही थी
मैं कभी सहमा नहीं;
उस घृणित आचार से भी;
तुम सभी नजरें बचाकर;
देखते थे प्यार से भी।
मैं स्वयं नव यौवना सा-
चकित लज्जित मचलता था।
गुप्त धन-यौवन बना था;
वह पुलक कर उछलता था।
तुम सदय प्रेमी सरिस-
मुझको छुपाकर घूमते थे
और फिर एकांत पाकर;
धन सहित ही चूमते थे
याद है उ दिन तुम्हारी-प्रिया
बुलट से टकरा गयी थी;
और तुम घिसटे बहुत थे।
वह तुम्हारी ही प्रिया थी!
लौह निर्मित-
लौह का पाया ह्दय था;
इसलिए काटा तेरे ही हाथ में।
और मैं था रेशमी;
रेशम ह्दय था।
झट से सहलाने लगा था घाव को
रक्त रंजित मैं हुआ था;
और तुम सहमें हुए थे;
पर प्रिया पर दृष्टि तेरी जा जमी थी।
आह! यह दुर्भाग्य था;
मेरी कमी थी;
चंद सिक्कों का मेरा ही मूल्य था।
और स्कूटर-
कम्पनी जिसकी प्रिया थी
चोट देकर-
मूल्य पर इतरा रहा था..........................
पी रहा था खून मैं-
कसता हुआ;
और तेरे दर्द की मैं थाह था।
मैं रगों का लहू संचित रोककर;
स्वयं निष्ठा से समर्पण कर रहा था
और तेरे बहते लहू को रोककर;
प्राण अर्पण कर रहा था।
ढल रहा था रूप मेरा
ढेर धब्बे पड़ रहे थे।
पार कर यौवन जरा पर आ गया था
ज रेशे खुल गये-
ड़े हुए थे।
सोचता था मैं-
अंतिम बार अब कृतकृत्य हूँगा।
प्राण रक्षा कर तुम्हारी प्यार से;
इस धरा पर साथ रहकर सत्य हूँगा.
खोलकर निज बाहु से -
तुम मुझे कुछ अलग ही सा मान दोगे।
हृदय पर रखकर नहीं
अब हृदय के मध्य में स्थान दोगे,
और स्मृति पोटली में-
बंद करके;
तुम सहेजोगे मुझे उस उम्र तक;
जब तुम्हारी भी शिराओं में लहू थकने लगेगा
और में उस पूर्व यौवन की कथा-
फिर से रचूँगा।
रात दिन हँसता रहूँगा।
आह! पर यूँ रक्त रंजित फेंककर;
निज लहू को इस घृणा से देखकर;
कह रहे हो आज नव मानव कथा।
सोचते हो सिर्फ अपनी ही व्यथा।
हाँ चलो मैं वस्तु था-
पर काम आया अंत तक तेरे लिए।
है गिरा अब वस्तु से भी मूल्य तेरा 

तू कभी भी काम किसके आ सका है;
तू रहा लिपटा सदा ही स्वार्थ में;
क्या कभी परमार्थ-मोती ला सका है।
है यही इतिहास से स्पष्ट होता;
हम जिसे मानव समझते आ रहे है;
सत्य है वह जानवरों से भ्रष्ट होता।
प्राप्त कर जिनके लहू की लालिमा को,
वह उगा सूरज सरिस,
अब तप रहा है;
है लहू उसका सफेदी ले गया अब
भूल कर उनको-
स्वयं को जप रहा है।
भूल बैठा है स्वयं उत्पत्ति को;
गर्भ के क्षण को बृथाकर;
प्रसव पीड़ा मूल्य से उकता गया है।
धूर्त मानव!
है तेरी सीमा बता क्या?
नित्य प्रति तू स्वार्थ में चुकता गया है।
वीर्य लज्जित कर जनक का-
क्लीव सा फिरता भ्रमित है
तू दया का पात्र खुद है,
आज तू खुद से दु:खित है।
आह!मानव!
तू गिरा। गुजरा हुआ है
देव मंदिर देहरी का गीत था तू,
आज कोठे का-
असल मुजरा हुआ है?


डॉ. रामानुज अस्थाना

6 comments:

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  3. इस नए सुंदर से चिट्ठे के साथ हिंदी ब्‍लॉग जगत में आपका स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!

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  4. बहुत सुंदर भाव...
    आपका स्वागत है...

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  5. सुंदर प्रस्तुति....बधाई

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